बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने एक मस्जिद को लाउडस्पीकर इस्तेमाल करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी भी धर्म में लाउडस्पीकर या आवाज़ बढ़ाने वाले उपकरण के माध्यम से प्रार्थना करना अनिवार्य नहीं है। मस्जिद गौसिया (गोंदिया) की याचिका 1 दिसंबर को खारिज कर दी गई।
कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सका कि लाउडस्पीकर का उपयोग धार्मिक अभ्यास के लिए जरूरी या अनिवार्य है।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी धर्म में ऐसा नहीं कहा गया कि प्रार्थना दूसरों की शांति भंग करके की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि नागरिकों को शांति का अधिकार है, खासकर बच्चों, बुजुर्गों, बीमार और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों को।
कोर्ट ने शोर प्रदूषण को बार-बार उठने वाला गंभीर मुद्दा बताते हुए इस पर स्वत: संज्ञान लिया। शोर प्रदूषण से स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान हो सकता है—जैसे तनाव (cortisol releases), हृदय रोग, थकान, सिरदर्द, हाई ब्लड प्रेशर, मानसिक बीमारियाँ और चिंता। 120 डेसिबल से अधिक शोर कान के पर्दे फाड़ने तक का खतरा पैदा कर सकता है। नागपुर के सिविल लाइंस स्थित इवेंट हॉल्स और विभिन्न धार्मिक स्थलों पर शोर नियमों का बार-बार उल्लंघन होता पाया गया।
कोर्ट ने कहा कि समारोहों की अनुमति देने वाले स्थानों को नियमों के पालन की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। अदालत ने उम्मीद जताई कि महाराष्ट्र सरकार जनता के स्वास्थ्य पर असर डालने वाले इस मुद्दे पर प्रभावी समाधान लेकर आएगी।
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