गोंदिया: गोंदिया नगर परिषद के इतिहास में इस बार एक ऐसी स्थिति बनी है जिसने शहर की राजनीति में हलचल मचा दी है। नगर परिषद के सदन में वर्तमान में एक भी मुस्लिम प्रतिनिधि नहीं है। चुनाव के दौरान जब कोई मुस्लिम पार्षद जीतकर नहीं आया, तो यह उम्मीद जताई जा रही थी कि राजनीतिक दल 'को-ऑप्शन' (स्वीकृत सदस्य) के जरिए इस कमी को पूरा करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
प्रमुख नेताओं पर लग रहे हैं आरोप
शहर में इस बात को लेकर काफी चर्चा और नाराजगी है कि राकांपा (NCP) और कांग्रेस के बड़े नेताओं ने किसी भी मुस्लिम कार्यकर्ता को मौका नहीं दिया।
- विपक्ष की भूमिका पर सवाल: आरोप लग रहे हैं कि मुस्लिम समाज पारंपरिक रूप से कांग्रेस और राकांपा का समर्थन करता आया है। इसके बावजूद प्रफुल्ल पटेल, राजेंद्र जैन और गोपालदास अग्रवाल जैसे दिग्गज नेताओं ने को-ऑप्शन के लिए किसी मुस्लिम प्रतिनिधि का चयन नहीं किया।
- परिवारवाद की चर्चा: पूर्व विधायक गोपालदास अग्रवाल पर विशेष रूप से निशाना साधा जा रहा है। चर्चा है कि उन्होंने हमेशा अपने परिवार के सदस्यों (जैसे पराग अग्रवाल, विशाल अग्रवाल और अब प्रफुल्ल अग्रवाल) को ही को-ऑप्शन के जरिए सदन में भेजा है, जबकि किसी निष्ठावान मुस्लिम कार्यकर्ता को यह अवसर दिया जा सकता था।
विधायक विनोद अग्रवाल का अलग अंदाज
दूसरी ओर, भाजपा विधायक विनोद अग्रवाल के फैसले की काफी प्रशंसा हो रही है। उन्होंने चुनाव हारने के बावजूद अपने दलित नेता घनश्याम पानतवने को को-ऑप्शन सदस्य बनाकर सदन में भेजा है।
- कार्यकर्ता का सम्मान: राजनीतिक जानकारों का कहना है कि विनोद अग्रवाल ने यह साबित किया है कि वे अपने ईमानदार कार्यकर्ताओं के साथ खड़े रहते हैं।
- वोट बैंक की बदलती तस्वीर: घनश्याम पानतवने का मुस्लिम समाज के एक बड़े वर्ग में अच्छा प्रभाव माना जाता है। ऐसे में भाजपा का यह कदम भविष्य की राजनीति के लिए एक मजबूत संकेत माना जा रहा है।
समाज में बढ़ता असंतोष
नगर परिषद में प्रतिनिधित्व न मिलने के कारण मुस्लिम समाज के बीच निराशा और असंतोष का माहौल है। लोगों का मानना है कि जिन पार्टियों को उन्होंने वर्षों तक वोट दिया, उन्होंने ही उन्हें सत्ता के मंच से दूर रखा है।
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