अश्रुओं की भाषा और नीति शास्त्र का बोध: देवरी में भव्य मंदिर का शिलान्यास !



 देवरी (गोंदिया): आध्यात्मिकता और श्रद्धा के संगम के साथ, पट्टाचार्य 108 श्री विशुद्ध सागरजी महाराज के पावन सानिध्य में देवरी में दिगंबर जैन मंदिर के शिलान्यास का उत्सव संपन्न हुआ। यह आयोजन केवल पत्थर की नींव रखने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह गुरुदेव के विचारों के माध्यम से जीवन के दर्शन को समझने का एक दुर्लभ अवसर बना।



पांड्या परिवार के हाथों संपन्न हुआ अनुष्ठान

मंदिर निर्माण के इस पुनीत कार्य का शुभारंभ पांड्या परिवार के हाथों संपन्न हुआ। इस गौरवमयी पल के साक्षी बने:

  • पूर्व विधायक राजेंद्र जैन (जिनके द्वारा गुरुदेव को शास्त्र भेंट किए गए)

  • ज्ञानचंद जैन, नरेंद्र जैन, वसंत जैन और श्रेय जैन

पूरे परिवार ने श्रद्धापूर्वक गुरुदेव के पाद प्रक्षालन किए और मंगल क्रियाओं को पूर्ण किया। इस भव्य समारोह में गोंदिया, रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव और सालेकसा सहित कई शहरों से आए हजारों श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा।


गुरुवाणी: "चेहरों की भीड़ में खुदा को खोजो"

शिलान्यास के पश्चात आयोजित धर्मसभा में आचार्य श्री ने जीवन के उन पहलुओं पर प्रकाश डाला जो अक्सर अनदेखे रह जाते हैं। उनके प्रवचन के मुख्य बिंदु इस प्रकार रहे:

  • नीति शास्त्र की अनिवार्यता: गुरुदेव ने कहा कि केवल धर्म ग्रंथों का अध्ययन पर्याप्त नहीं है, मनुष्य को नीति शास्त्र भी पढ़ना चाहिए ताकि वह संसार में व्यवहार और विवेक का संतुलन बना सके।

  • अश्रुओं पर शोध (Thesis on Tears): विद्यार्थियों को एक अनोखा विषय देते हुए उन्होंने कहा, "आंखों के आंसू पर शोध करो। आंसुओं का रंग एक जैसा होता है, लेकिन उनके पीछे की भावना अलग होती है। आंखों का नम होना सरल है, पर उन आंसुओं के मर्म को पहचानना कठिन।"

  • नश्वरता का बोध: वर्तमान में बढ़ते प्रदर्शन के मोह पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि आज हम फोटो खिंचवाते हैं, लेकिन 20 साल बाद वही फोटो हमें अपनी ढलती उम्र और बदलते चेहरे का अहसास कराती है। उन्होंने संदेश दिया कि "चेहरे देखते-देखते चेहरे बिगड़ गए, अब भगवान का चेहरा देखो जिससे जीवन सुधर जाए।"

  • विनम्रता का महत्व: अपनी पलकों को झुकाकर रखने (विनम्र रहने) की सीख देते हुए उन्होंने कहा कि जो झुकना जानता है, दुनिया उसे अपनी पलकों पर बिठाती है।


विशेष संदेश: "मैं उस सत्ता में विलीन होना चाहता हूँ जिसका कोई चेहरा नहीं है, क्योंकि जो निराकार है वही शाश्वत है।" — आचार्य विशुद्ध सागरजी


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